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Tuesday, 10 February 2015

अनपढ हृदय

अनपढ हृदय : यहाँ कोई कक्षा नहीं कोई पूछने बताने वाला नहीं,मैं तो बस बिना देखे सुने अपने समय काल का निर्वहन करता चल रहा हूँ।कोई आता भी है उसे अपने स्वभाविक गुण से अपना प्रेम रूपी भोजन परोस देता हूँ स्थान भी दे देता हूँ पर न जाने सभी इतने सभ्य की अपने गुप्त गुण को हमेशा विस्तारित करते और उसे हि छिद्रित करते जो स्थान उसे प्रेम परोसता।अब तो मेरा स्थान नहीं दिखता, कितना पारदर्शी था मैं परन्तु इतने छिद्रों ने तो अब,अपारदर्शी बना दिया।पूर्ण रूप से नग्न बाल्यावस्था की मधु झरती रहती थी मुझ से ,न जाने कब प्रौढ़ हो अपने को छिपाने लगा।कहा था कि मुझ हृदय में ही तो तू बसता है,ये देख तेरा बसेरा उजाड़ तुझे ही खानाबदोश कर दिया।अब मैं तो रहा नहीं, कभी कभी तेरी सुगंध यहाँ रखे तेरे वाद्य यन्त्रों से सुनाई देती है।इसी लालसा में शायद अलविदा करुँ कि तुझ तक की सीढ़ी यहीं से जाती है वरना इस आधुनिक चिकित्सकों ने तो पेस मेकर की रस्सी तय्यार कर रखी है।

Astrologer Money Dhasmana
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